932. Хишам от отца своего, сообщает: «Перед Аишей было упомянуто, что Ибн Умар передает от Пророка: «Истинно, мертвый наказывается в своей могиле плачем его семьи по нему». И она сказала: «Разве так?! Посланник Аллаха, сказал вот что: «Истинно, он наказывается за своё прегрешение и за свой грех и его семья плачет теперь по нему». Это соотносится с высказыванием, произнесенным Посланником Аллаха, надо рвом в день Бадра. В нем были убитые в день Бадра многобожники. И он сказал им то, что сказал: «Они сейчас слышат то, что я говорю». А возможно, он сказал им лишь это: «Они, конечно же, теперь знают, что сказанное мною -истина». Затем был прочтён (аят): «Истинно, ты не можешь сделать так, чтобы мертвые слышали…» До конца аята. «И ты не можешь сделать так, чтобы те, кто в могилах слышали». Он говорил: «Это, когда они заняли свои седалища в Огне».
26 — (932) حدثنا أبو كريب. حدثنا أبو أسامة عن هشام، عن أبيه، قال: ذكر عند عائشة ؛ أن ابن عمر يرفع إلى النبي صلى الله عليه وسلم:
"إن الميت يعذب في قبره ببكاء أهله عليه". فقالت: وهل. إنما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم "إنه ليعذب بخطيئته أو بذنبه. وإن أهله ليبكون عليه الآن". وذاك مثل قوله: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قام على القليب يوم بدر. وفيه قتلى بدر من المشركين. فقال لهم ما قال: "إنهم ليسمعون ما أقول" وقد وهل. إنما قال: "إنهم ليعلمون أن ماكنت أقول لهم حق" ثم قرأت: {إنك لا تسمع الموتى}. [27 /النمل/ الآية 80]. {وما أنت بمسمع من في القبور}. [35 /فاطر/ الآية 22]. يقول: حين تبوؤا مقاعدهم من النار.
(932) وحدثناه أبو بكر بن أبي شيبة. حدثنا وكيع. حدثنا هشام بن عروة، بهذا الإسناد. بمعنى حديث أبي أسامة. وحديث أبي أسامة أتم.
27 — (932) وحدثنا قتيبة بن سعيد عن مالك بن أنس، فيما قرئ عليه، عن عبدالله بن أبي بكر، عن أبيه، عن عمرة بنت عبدالرحمن ؛ أنها أخبرته ؛ أنها سمعت عائشة، وذكر لها أن عبدالله بن عمر يقول:
إن الميت ليعذب ببكاء الحي. فقالت عائشة: يغفر الله لأبي عبدالرحمن. أما أنه لم يكذب. ولكنه نسى أو أخطأ. إنما مر رسول الله صلى الله عليه وسلم على يهودية يبكى عليها. فقال "إنهم ليبكون عليها. وإنها لتعذب في قبرها".