Муслим — 2770-0.

2770-0. Алькам Ибн Ваккас и Убайдулла Ибн Абдулла Ибн Утба Ибн Масуд сообщил хадис про Аишу, супругу Пророка, о том событии, когда клеветники распространили о ней ложь и как Аллах доказал её невиновность. Каждый из них передал мне свод её хадисов. Некоторые помнили её хадисы лучше других, рассказывали надёжнее и я сохранил в памяти от каждого из них по хадису. В общем, хадис одного поддерживает хадис другого в том, что Аиша, супруга Пророка, сказала: «Когда Посланник Аллаха, намеревался отправиться в путешествие, он проводил жеребьёвку между своими женщинами. Та, чей жребий выпадет, и ехала вместе с ним». Аиша сказала: «И вот, перед одним из боевых походов, он провёл меж нами жеребьёвку и выпал мой жребий. Именно мне предстояло выйти в путь вместе с Посланником Аллаха. Ну, а было это уже после того, как снизошёл хиджаб, поэтому меня посадили в паланкин на спине верблюда, в котором я и провела всю дорогу до окончания Посланником Аллаха, данного похода. Уже на подступах к Медине, когда настала ночь, он провозгласил о снятии с привала. Я же, когда было объявлено о снятии с привала, вышла и, миновав войско, справила своё дело. После я повернулась в сторону своего транспорта, но вдруг, прикоснувшись к своей груди, обнаружила, что моё ожерелье из когтей оникса, оборвалось. Поэтому я вернулась и принялась искать своё ожерелье, из-за чего и вышла эта задержка. А в это время люди, снаряжавшие меня в путь, подошли к моему паланкину, взяли его и закрепили его на верблюде, на котором я ехала, сочтя, что я нахожусь в нём!» Она сказала: «В те времена женщины были лёгкими, а не заплывшими жиром и не увесистыми, потому что питались крошками от еды. Вот поэтому им и не показалась странной лёгкость паланкина, когда они закрепили его и подняли его. К тому же, я сама была ещё малолетней девочкой. Они подняли верблюда на ноги и тронулись. Я нашла своё ожерелье, но войско уже отбыло! Я пришла на места их стоянок, но там уже никто не подавал голоса и не отзывался. Тогда я разыскала место своего привала. Мне казалось, что люди спохватятся меня и вернутся за мной. Я всё сидела на своём месте, пока меня не сморил сон, и тогда я заснула. Сафван Ибн Аль-Муаттыль Аль-Са-лямий, впоследствии Аль-Закяваний, остановился на привал позади войска. Поэтому он, когда двинулся в путь, наутро оказался возле места моего ночлега. Увидев черноту (волос) спящего человека, он подошёл ко мне и узнал меня, потому что видел меня ещё до того, как на меня был наброшен хиджаб. Тогда я и проснулась от его предупредительного возгласа и закрыла своё лицо платьем. (Под предупредительным возгласом подразумевается либо «Ассаляму алейкум!»; либо «Йэ сатир!» что значит «О, Закрывающий людскую наготу!» Чтобы Аиша могла оправиться и прикрыться до того, как он подойдёт к ней и посадит её на верблюдицу. — п.п.) Клянусь Аллахом, он не сказал мне ни слова и я не услышала от него ни слова, за исключением этого его предупредительного возгласа. Наконец, он подвёл свою верблюдицу и заставил её присесть на передние ноги. Я забралась на неё, а он повёл эту верблюдицу, идя пешком. Мы вошли в стан войска уже после того, как оно остановилось на послеполуденный привал в страшную жару (муваггарина). Именно тогда и загубили свою жизнь те самые, которые принялись шептаться про меня. А зачинщиком этого был Абдулла Ибн Убай Ибн Салюль. И вот, мы прибыли в Медину, после чего я проболела целый месяц, а люди с возбуждением тонули в пересудах клеветников. Я же об этом даже не подозревала! Во время этой моей болезни меня беспокоило лишь только то, что Посланник Аллаха, не был нежен ко мне как обычно, когда я заболевала. Теперь же Посланник Аллаха, просто входил, желал мира, а затем спрашивал: «Как там эта?» Вот это и волновало меня, а я ничего плохого ещё и не подозревала! Так продолжалось до тех пор, пока я не вышла из дому, уже поправившись. Вместе со мной пошла и Умм Мустых в сторону Манасы’а. Это место, где мы справляли тяжёлую надобность. Ходили мы туда только ночью. Тогда мы ещё не успели построить туалет рядом с нашими домами. Мы относились к этому так же, как и древние арабы — мы справляли свою нужду на открытой местности, а строить туалеты рядом со своими домами нам было противно. Ну, так вот. Пошли мы с Умм Мустых, которая являлась дочерью Абу Рахма Ибн Аль-Мутталиба Ибн Абд манафа. Её матерью являлась дочь Сахра Ибн Амира, а ещё и тётей по материнской линии для Абу Бакра Аль-Сыддыка. У неё — сын Мустых Ибн Асаса Ибн Аббад Ибн Аль-Мутталиб. И вот, справив нужду, мы с дочерью Умм Рахма направились уже обратно ко мне домой и вдруг,

56 — 2770 حدثنا حبان بن موسى. أخبرنا عبدالله بن المبارك. أخبرنا يونس بن يزيد الأيلي. ح وحدثنا إسحاق بن إبراهيم الحنظلي ومحمد بن رافع وعبد بن حميد. (قال ابن رافع: حدثنا. وقال الآخران: أخبرنا) عبدالرزاق. أخبرنا معمر. والسياق حديث معمر من رواية عبد وابن رافع. قال يونس ومعمر. جميعا عن الزهري: أخبرني سعيد بن المسيب وعروة بن الزبير وعلقمة بن وقاص وعبيدالله بن عبدالله بن عتبة بن مسعود عن حديث عائشة، زوج النبي صلى الله عليه وسلم حين قال لها أهل الإفك ما قالوا. فبرأها الله مما قالوا. وكلهم حدثني طائفة من حديثها. وبعضهم كان أوعى لحديثها من بعض. وأثبت اقتصاصا. وقد وعيت عن كل واحد منهم الحديث الذي حدثني. وبعض حديثهم يصدق بعضا. ذكروا؛ أن عائشة، زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت:

كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أراد أن يخرج سفرا، أقرع بين نسائه. فأيتهن خرج سهمها، خرج بها رسول الله صلى الله عليه وسلم معه. قالت عائشة: فأقرع بيننا في غزوة غزاها. فخرج سهمي. فخرجت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم. وذلك بعدما أنزل الحجاب. فأنا أحمل هودجي، وأنزل فيه، مسيرنا. حتى إذا فرغ رسول الله صلى الله عليه وسلم من غزوه، وقفل، ودنونا من المدينة، آذن ليلة بالرحيل. فقمت حين آذنوا بالرحيل. فمشيت حتى جاوزت الجيش. فلما قضيت من شأني أقبلت إلى الرحل. فلمست صدري فإذا عقدي من جزع ظفار قد انقطع. فرجعت فالتمست عقدي فحبسني ابتغاؤه. وأقبل الرهط الذين كانوا يرحلون لي فحملوا هودجي. فرحلوه على بعيري الذي كنت أركب. وهم يحسبون أني فيه. قالت: وكانت النساء إذ ذاك خفافا. لم يهبلن ولم يغشهن اللحم. إنما يأكلن العلقة من الطعام. فلم يستنكر القوم ثقل الهودج حين رحلوه ورفعوه. وكنت جارية حديثة السن. فبعثوا الجمل وساروا. ووجدت عقدي بعد ما استمر الجيش. فجئت منازلهم وليس بها داع ولا مجيب. فتيممت منزلي الذي كنت فيه. وظننت أن القوم سيفقدوني فيرجعون إلي. فبينا أنا جالسة في منزلي غلبتني عيني فنمت. وكان صفوان بن المعطل السلمي، ثم الذكواني، قد عرس من وراء الجيش فادلج. فأصبح عند منزلي. فرأى سواد إنسان نائم. فأتاني فعرفني حين رآني. وقد كان يراني قبل أن يضرب الحجاب علي. فاستيقظت باسترجاعه حين عرفني. فخمرت وجهي بجلبابي. ووالله! ما يكلمني كلمة ولا سمعت منه كلمة غير استرجاعه. حتى أناخ راحلته. فوطئ على يدها فركبتها. فانطلق يقود بي الراحلة. حتى أتينا الجيش. بعد ما نزلوا موغرين في نحر الظهيرة. فهلك من هلك في شأني. وكان الذي تولى كبره. عبدالله بن أبي بن سلول.

فقدمنا المدينة. فاشتكيت، حين قدمنا المدينة، شهرا. والناس يفيضون في قول أهل الإفك. ولا أشعر بشيء من ذلك. وهو يريبني في وجعي أني لا أعرف من رسول الله صلى الله عليه وسلم اللطف الذي كنت أرى منه حين أشتكي. إنما يدخل رسول الله صلى الله عليه وسلم فيسلم ثم يقول "كيف تيكم؟" فذاك يريبني. ولا أشعر بالشر. حتى خرجت بعدما نقهت وخرجت معي أم مسطح قبل المناصع. وهو متبرزنا. ولا نخرج إلا ليلا إلى ليل. وذلك قبل أن نتخذ الكنف قريبا من بيوتنا. وأمرنا أمر العرب الأول في التنزه. وكنا نتأذى بالكنف أن نتخذها عند بيوتنا. فانطلقت أنا وأم مسطح، وهي بنت أبي رهم بن المطلب بن عبد مناف. وأمها ابنة صخر بن عامر، خالة أبي بكر الصديق. وابنها مسطح بن أثاثة بن عباد بن المطلب. فأقبلت أنا وبنت أبي رهم قبل بيتي. حين فرغنا من شأننا. فعثرت أم مسطح في مرطها. فقالت: تعس مسطح. فقلت لها: بئس ما قلت. أتسبين رجلا قد شهد بدرا. قالت: أي هنتاه! أو لم تسمعي ما قال؟ قلت: وماذا قال؟ قالت، فأخبرتني بقول أهل الإفك. فازددت مرضا إلى مرضي. فلما رجعت إلى بيتي، فدخل علي رسول الله صلى الله عليه وسلم. فسلم ثم قال "كيف تيكم؟" قلت: أتأذن لي أن آتي أبوي؟ قالت، وأنا حينئذ أريد أن أتيقن الخبر من قبلهما. فأذن لي رسول الله صلى الله عليه وسلم. فجئت أبوي فقلت لأمي: يا أمتاه! ما يتحدث الناس؟ فقالت: يا بنية! هوني عليك. فوالله! لقلما كانت امرأة قط وضيئة عند رجل يحبها، ولها ضرائر، إلا كثرن عليها. قالت قلت: سبحان الله! وقد تحدث الناس بهذا.

قالت، فبكيت تلك الليلة حتى أصبحت لا يرقأ لي دمع ولا أكتحل بنوم. ثم أصبحت أبكي. ودعا رسول الله صلى الله عليه وسلم علي بن أبي طالب وأسامة بن زيد حين استلبث الوحي. يستشيرهما في فراق أهله. قالت فأما أسامة بن زيد فأشار على رسول الله صلى الله عليه وسلم بالذي يعلم من براءة أهله، وبالذي يعلم في نفسه لهم من الود. فقال: يا رسول الله! هم أهلك ولا نعلم إلا خيرا. وأما علي بن أبي طالب فقال: لم يضيق الله عليك. والنساء سواها كثير. وإن تسأل الجارية تصدقك. قالت فدعا رسول الله صلى الله عليه وسلم بريرة فقال "أي بريرة! هل رأيت من شيء يريبك من عائشة؟" قالت له بريرة: والذي بعثك بالحق! إن رأيت عليها أمرا قط أغمصه عليها، أكثر من أنها جارية حديثة السن، تنام عن عجين أهلها، فتأتي الداجن فتأكله. قالت فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم على المنبر. فاستعذر من عبدالله بن أبي، ابن سلول. قالت فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو على المنبر "يا معشر المسلمين! من يعذرني من رجل قد بلغ أذاه في أهل بيتي. فوالله! ما علمت على أهلي إلا خيرا. ولقد ذكروا رجلا ما علمت عليه إلا خيرا. وما كان يدخل على أهلي إلا معي" فقام سعد بن معاذ الأنصاري فقال: أنا أعذرك منه. يا رسول الله! إن كان في الأوس ضربنا عنقه. وإن كان من إخواننا الخزرج أمرتنا ففعلنا أمرك. قالت فقام سعد بن عبادة، وهو سيد الخزرج، وكان رجلا صالحا. ولكن اجتهلته الحمية. فقال لسعد بن معاذ: كذبت. لعمر الله! لا تقتله ولا تقدر على قتله. فقام أسيد بن حضير، وهو ابن عم سعد بن معاذ، فقال لسعد بن عبادة: كذبت. لعمر الله! لنقتلنه. فإنك منافق تجادل عن المنافقين. فثار الحيان الأوس والخزرج. حتى هموا أن يقتتلوا. ورسول الله صلى الله عليه وسلم قائم على المنبر. فلم يزل رسول الله صلى الله عليه وسلم يخفضهم حتى سكتوا وسكت.

قالت وبكيت يومي ذلك. لا يرقأ لي دمع ولا أكتحل بنوم. ثم بكيت ليلتي المقبلة. لا يرقأ لي دمع ولا أكتحل بنوم. وأبواي يظنان أن البكاء فالق كبدي. فبينما هما جالسان عندي، وأنا أبكي، استأذنت علي امرأة من الأنصار فأذنت لها. فجلست تبكي. قالت فبينا نحن على ذلك دخل علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم. فسلم ثم جلس. قالت ولم يجلس عندي منذ قيل لي ما قيل. وقد لبث شهرا لا يوحى إليه في شأني بشيء. قالت فتشهد رسول الله صلى الله عليه وسلم حين جلس ثم قال "أما بعد. يا عائشة! فإنه قد بلغني عنك كذا وكذا. فإن كنت بريئة فسيبرئك الله. وإن كنت ألممت بذنب. فاستغفري الله وتوبي إليه. فإن العبد إذا اعترف بذنب ثم تاب، تاب الله عليه" قالت فلما قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم مقالته، قلص دمعي حتى ما أحس منه قطرة. فقلت لأبي: أجب عني رسول الله صلى الله عليه وسلم فيما قال. فقال: والله! ما أدري ما أقول لرسول الله صلى الله عليه وسلم. فقلت لأمي: أجيبي عني رسول الله صلى الله عليه وسلم. فقالت: والله! ما أدري ما أقول لرسول الله صلى الله عليه وسلم.

فقلت، وأنا جارية حديثة السن، لا أقرأ كثيرا من القرآن: إني، والله! لقد عرفت أنكم قد سمعتم بهذا حتى استقر في نفوسكم وصدقتم به. فإن قلت لكم إني بريئة، والله يعلم أني بريئة، لا تصدقوني بذلك. ولئن اعترفت لكم بأمر، والله يعلم أني بريئة، لتصدقونني. وإني، والله! ما أجد لي ولكم مثلا إلا كما قال أبو يوسف: فصبر جميل والله المستعان على ما تصفون.

قالت ثم تحولت فاضطجعت على فراشي. قالت وأنا، والله! حينئذ أعلم أني بريئة. وأن الله مبرئي ببراءتي. ولكن، والله! ما كنت أظن أن ينزل في شأني وحي يتلى. ولشأني كان أحقر في نفسي من أن يتكلم الله عز وجل في بأمر يتلى. ولكني كنت أرجو أن يرى رسول الله صلى الله عليه وسلم في النوم رؤيا يبرئني الله بها.

قالت: فوالله! ما رام رسول الله صلى الله عليه وسلم مجلسه، ولا خرج من أهل البيت أحد، حتى أنزل الله عز وجل على نبيه صلى الله عليه وسلم. فأخذه ما كان يأخذه من البرحاء عند الوحي. حتى إنه ليتحدر منه مثل الجمان من العرق، في اليوم الشات، من ثقل القول الذي أنزل عليه. قالت، فلما سري عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، وهو يضحك، فكان أول كلمة تكلم بها أن قال "أبشري. يا عائشة! أما الله فقد برأك "فقالت لي أمي: قومي إليه. فقلت: والله! لا أقوم إليه. ولا أحمد إلا الله. هو الذي أنزل براءتي. قالت فأنزل الله عز وجل: {إن الذين جاءوا بالإفك عصبة منكم} [24 /النور /11] عشر آيات. فأنزل الله عز وجل هؤلاء الآيات براءتي. قالت فقال أبو بكر، وكان ينفق على مسطح لقرابته منه وفقره: والله! لا أنفق عليه شيئا أبدا. بعد الذي قال لعائشة. فأنزل الله عز وجل:{ولا يأتل أولوا الفضل منكم والسعة أن يؤتوا أولي القربى}[24/النور/22] إلى قوله: {ألا تحبون أن يغفر الله لكم}.

قال حبان بن موسى: قال عبدالله بن المبارك: هذه أرجى آية في كتاب الله.

فقال أبو بكر: والله! إني لأحب أن يغفر الله لي. فرجع إلى مسطح النفقة التي كان ينفق عليه. وقال: لا أنزعها منه أبدا.

قالت عائشة: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم سأل زينب بنت جحش، زوج النبي صلى الله عليه وسلم عن أمري "ما علمت؟ أو ما رأيت؟" فقالت: يا رسول الله! أحمي سمعي وبصري. والله! ما علمت إلا خيرا.

قالت عائشة: وهي التي كانت تساميني من أزواج النبي صلى الله عليه وسلم. فعصمها الله بالورع. وطفقت أختها حمنة بنت حجش تحارب لها. فهلكت فيمن هلك.

قال الزهري: فهذا ما انتهى إلينا من أمر هؤلاء الرهط.

وقال في حديث يونس: احتملته الحمية.

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